Saturday, April 21, 2012

अपर्णा : सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग से निकलती वतन लौटने की राह

View of a block of the building coming under APARNA
बात सन 2009 की है। मुंबई के धारावी में बिहारी मूल के लोगों के एक संगठन अंजुमन-ए-बाशिंदगाने-बिहार के कार्यालय में अहसान हुसैन, अनवर कमाल, मुखियाजी एवम अन्य लोगों से मुलाक़ात होती है। मुखियाजी कभी बिहार में मुखिया हुआ करते थे। रोजी-रोटी की तलाश में मुम्बई आना पड़ा, पर तमाम दिक्कतों के बाद भी सामाजिक कार्य करने की आदत नहीं छूटी। शायद इसीलिए आज भी लोग उन्हे उनके नाम की बजाय मुखियाजी ही बुलाते हैं। वहीं हुई मुलाक़ात में कई लोग अपनी दुकान पे आने का न्योता देते है। अहसान हुसैन एवम अनवर कमाल के साथ मैं निकाल जाता हूँ कुछ लोगों से मिलने के लिए। लेदर की एक दुकान में अहमद भाई अपने बनाए जैकेट दिखाते हैं। एक एल्बम दिखाते हैं जिसमें जैकेट के कई डिज़ाइन हैं। बड़े ही गर्व से ताते हैं कि यह डिज़ाइन अक्षय कुमार के लिए बनाया था, फलां फिल्म के लिए। बातों में पता चलता है कि धारावी में लेदर के काम में बिहार के काफी लोग लगे हुए हैं। कई लोगों ने तो मेहनत कर के काफी अच्छा स्थान बना लिया है, पर कई लोग ऐसे भी हैं जो अभी भी संघर्ष कर रहे हैं। उनकी हालत अच्छी नहीं है। बातों-बातों में उनसे पूछा कि यही काम आपलोग बिहार में क्यूँ नहीं करते। तो जवाब था कि अगर सरकार सुविधा दे तो वहाँ भी कर सकते हैं। कौन अपने घर परिवार, अपनी ज़मीन से दूर रहना चाहता है। इस बात में उम्मीद की एक किरण दिखाई दी।
कुछ समय के बा बिहार फ़ाउंडेशन के मुंबई चैप्टर के औपचारिक उदघाटन का कार्यक्रम तय हुआ। इस उदघाटन कार्यक्रम के दौरान कुछ लघु एवम मध्यम उद्यमियों की एक बैठक माननीय उप-मुख्यमंत्री महोदय के साथ तय हुई। श्री टी0 वी0 सिन्हा जो मुंबई चैप्टर के उपाध्यक्ष भी हैं, की तैयारियों और सटीक प्रेजेंटेशन के कारण बैठक सफल रही। श्री सुशील कुमार मोदी, माननीय उप-मुख्यमंत्री बिहार ने लोगों को हर संभव मदद का भरोसा दिया, जिसके फलस्वरूप लोगों ने प्रयास शुरू किया। एक नए आइडिया का जन्म हो चुका था, बस जरूरत थी तो उसे मूर्त रूप देने की।
अहसान हुसैन ने तमाम छोटे-बड़े उद्यमियों के घर जा-जा कर उनसे बात की। इसी क्रम में ज़री के काम में लगे इफ़्तेखर अहमद से मुलाक़ात हुई। इस क्षेत्र में भी बिहार के काफी लोग काम कर रहे थे। ज़्यादातर कारीगर। इफ़्तेखर अहमद ने ज़री के काम में लगे बिहारी लोगों को संगठित किया। इस तरह धीरे-धीरे कर के लगभग 150 लोग जुड़ गए, इस प्रयास से। सबों ने हस्ताक्षर कर के बिहार फ़ाउंडेशन मुंबई चैप्टर को अपना प्रस्ताव दिया। कोई पाँच लाख तो कोई 50 लाख तो कोई उस से भी ज्यादा का निवेश करना चाहता था बिहार में। इस तरह कुल मिलकर समेकित निवेश लगभग 30 करोड़ का हो गया। अब प्रश्न था इस प्रयास के लिए एक जगह का जहां ये लोग अपनी यूनिट को स्थापित कर सकें। सर्वप्रथम इसके लिए कंपनी एक्ट के सेक्शन 25 के तहत एक नॉन-प्रॉफ़िट कंपनी के रूप में रजिस्ट्रेशन कराया गया, जिसका नाम रखा गया APARNA, यानि Association Of Progressive And Resurgent Nationalist Awamलोगों ने श्री अहसान हुसैन को इस कंपनी के डाइरेक्टर की ज़िम्मेदारी सौंपी। एसी के कारोबार से जुड़े श्री हुसैन पिछले 15 सालों से धारावी में बिहारियों के लिए सामाजिक कार्य में सक्रिय रहे हैं। और संभवतः इसी कारण लोगों ने उनपर अपना भरोसा दिखाया। इसके बाद बियाडा में ज़मीन के लिए आवेदन किया गया। बियाडा की तरफ से पटना के फतुहा में ज़मीन आवंटित की गयी।
आम तौर पर स्टील या एस्बेस्टस की चादरों से बड़ी-बड़ी शेड बना कर कारख़ाना लगाया जाता है। पर यह एक अलग मोडेल था। उसके लिए एक बहुमंज़िली इमारत बनाने की परिकल्पना की गयी, जिसमें सभी अपनी आवश्यकता के अनुसार जगह ले सकें ठीक वैसे ही जैसे मुंबई में गाला डालकर काम करते हैं लोग। कोई पाँच सौ वर्गफीट तो कोई एक हज़ार तो कोई पाँच हज़ार। जिसकी जितनी जरूरत। और इस इमारत का डिज़ाइन तैयार किया देश के जाने माने आर्किटेक्ट श्री हाफिज़ कौनट्रैक्टर ने। इस औद्योगिक संकुल में ना सिर्फ निर्माण कार्य की सुविधा होगी बल्कि अन्य मूलभूत सुविधाएं भी विकसित की जाएंगी। एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, एक पोस्ट ऑफिस, एक एटीएम और बैंक की सुविधा रखे जाने का प्रस्ताव है। अगर सब कुछ ठीक रहा तो अगले फेज़ में एक प्राथमिक स्कूल की सुविधा भी विकसित की जाएगी वहाँ।
24 अप्रैल 2012 को अक्षय त्रित्या के पावन अवसर पर इस भवन के निर्माण कार्य का भूमि पूजन और शिलान्यास का कार्यक्रम है। बिहार फ़ाउंडेशन के प्रयास से एक और सपना सच होने वाला है। अभी वर्तमान में अपर्णा के प्रथम चरण में 350 उद्यमी और लगभग 4000 बिहारी मजदूर अपने वतन वापस आ रहे हैं, जो मुख्यतः सॉफ्ट लगेज एवम चमड़े से जुड़ी सामग्रियों का निर्माण करेंगे। प्रथम चरण में तीन टावरों का निर्माण होगा जिसका नाम भी बिहार की धरती के कर्मयोधाओं के नाम पर क्रमशः चन्द्रगुप्त, अशोक और शेरशाह रखा जाएगा। अब कुल निवेश 250 करोड़ से ज्यादा का हो गया है और इससे सीधे लगभग दस हज़ार लोगों को रोजगार मिलने की संभावना है। यह सिर्फ भावुक प्रयास ही नहीं बल्कि पूर्णतः आर्थिक भी है। सूक्षम, लघु और मध्यम स्तर के अनेक निवेशकों के मिलने से समेकित रूप से एक बड़ा निवेश हो पा रहा है। यह वह क्षेत्र है जिसमें अपार संभावनाएं हैं। रोजगार के अवसर ज्यादा हैं। कई विकसित देशों ने इस मॉडेल पर काम करके विकास की राह पकड़ी है। आज बिहार की जो स्थिति है उसके अनुसार सूक्षम, लघु और मध्यम स्तर के उद्योगों से विकास की राह पर कदम रखा जा सकता है। कई लोगों को रोजगार मिल सकता है। गाँवों के छोटे-छोटे घरेलू उद्यमों को बाज़ार मिल सकता है।
आज पटना में जिस हिसाब से ज़मीन की कमी दिख रही है। उस हिसाब से हॉरिजॉन्टल ना बढ़ कर वर्टिकल बढ़ना भविष्य के लिए एक मॉडेल होगा। अपर्णा संप्रति अपने आप में पहला ऐसा प्रयास है, जो  बहुतेरे लोगों को एक छाते के नीचे लाने के लिए एक उदाहरण होगा। प्रवासी लोगों के रिवरस माईग्रेशन के लिए एक मॉडेल होगा अपर्णा। साथ ही यह भी उम्मीद है कि जब यह बिल्डिंग बन कर तैयार होगी तो जिस तरह लोग ताजमहल या गोलघर को देखने आते हैं, उसी तरह इस बिल्डिंग को भी देखने आएंगे। अपनी ज़मीन से जुडने और उसे समृद्ध बनाने हेतु लोगों का समेकित प्रयास जो है यह।

Tuesday, February 14, 2012

ग्लोबल बिहार समिट 2012

दूसरा ग्लोबल बिहार समिट 17 से 19 फ़रवरी 2012 को पटना में होने जा रहा है। ऐसी उम्मीद है कि यह पिछले बार के ग्लोबल समिट से कई मायनों में एक कदम आगे होगा। इसमें आने वाले लोग न सिर्फ अपनी दक्षता से विभ्भिन क्षेत्रों में बिहार के विकास की रूप रेखा की चर्चा करेंगे, बल्कि किस तरह से सरकार, यहाँ के नागरिक, प्रवासी बिहारी और विशेषज्ञ अपने-अपने स्तर से उसमें योगदान दे सकते हैं; किस तरह से सबके साझा योगदान से राज्य को और आगे ले जाया जा सकता है, एक विकसित राज्य बनाया जा सकता है, की भी चर्चा की जाएगी।
       अगर आपको याद हो तो जिस समय पिछला ग्लोबल समिट हुआ था उस वक़्त बिहार ने विकास के पथ पर कदम ही रखा था। वो बिहार जो कभी हर क्षेत्र में पथ प्रदर्शक हुआ करता था वह बिहार अपनी पहचान के संकट से गुजर रहा था। बाहर रहने वाले बिहारी खुद की पहचान बताने से कतराते थे। 2007 की उस जनवरी में देश-विदेश के कई गणमान्य लोग जुटे और किस तरह से बिहार को रास्ते पर लाया जाए इसकी चर्चा की गयी। उस चर्चा के आधार पर विभ्भिन क्षेत्रों में कार्य-योजना बनाई गयी या कार्य-योजना बनाने का मार्ग प्रशस्त हुआ। लोगों ने विशेषज्ञों के नज़रिये से भी सोंचना शुरू किया। इसके बाद एक और साकारात्मक चीज़ देखने को मिली वो यह थी कि बाहरी लोगों ने बिहार को साकारात्मक तरीके से देखना शुरू किया। आज बिहार प्रगति की राह पर चल रहा है। कई कदम आगे बढ़ चुका है, पर अभी भी काफी लंबा रास्ता तय करना बाकी है। ऐसे में बिहार को अब प्रगति की रफ्तार को और तेज़ करने की आवश्यकता महसूस हुई। इसी को ध्यान में रखकर बिहार की स्थापना के सौ वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में दूसरा ग्लोबल समिट आयोजित किया जा रहा है।
      तीन दिनों तक चलने वाले इस समिट का उदघाटन 17 फ़रवरी को नेपाल के प्रधानमंत्री श्री बाबू राम भट्टराई के द्वारा माननीय मुख्यमंत्री श्री नीतिश कुमार एवम माननीय उप-मुख्यमंत्री श्री सुशील कुमार मोदी की उपस्थिति में किया जाएगा। उसी दिन प्रथम प्लेनरी सत्र रखा गया है जिसकी अध्यक्षता राज्यसभा सदस्य श्री एन0के0सिंह के द्वारा की जाएगी। इस प्लेनरी का विषय "कम विकसित क्षेत्रों को समग्र विकास की मुख्यधारा में लाने हेतु कार्य योजना" है और इस सत्र में रिजर्व बैंक के गवर्नर श्री डी0 सुबबराओ, लंदन स्कूल ऑफ इक्नोमिक्स के लॉर्ड निकोलस स्टर्न एवं योजना आयोग के उपाध्यक्ष श्री मोंटेक सिंह अहलूवालिया भी अपने विचारों से लोगों को अवगत करायेँगे। संध्या में आगंतुकों हेतु एक सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया है, जिसमें बिहार के लोक गीत और लोक नृत्य की प्रस्तुति की जाएगी। इसमें बिहार के लोक संगीत में प्रयोग में आने वाले विभ्भिन वाद्य यंत्रों पर आधारित एक प्रस्तुति भी रखी गयी है। साथ ही बिहार के गौरव को प्रदर्शित करती बिहार गौरव गान को प्रस्तुत किया जाएगा।
            इस समिट में कुल 6 प्लेनरी एवं 11 पैरलल सेशन रखे गए हैं जो शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सशक्तिकरण, औद्योगिक विकास, आधारभूत संरचना विकास, कृषि विकास, शहरी विकास, पर्यटन विकास, उद्यमिता विकास, समग्र विकास, सांस्कृतिक पुनर्जागरण इत्यादि थीम पर आधारित हैं। 18 देशों से लगभग 1000 प्रतिनिधियों के भाग लेने की संभावना है।
      यह प्रवासी बिहारियों और बिहार के शुभचिंतकों का समागम है, जो एक ऐसा मंच प्रदान करता है जिसमें अपने क्षेत्र के दिग्गज, सरकार के प्रतिनिधि, और बिहार में काम करने वाले एक साथ आकार अपने विचार, योजना और अनुभव से कुछ ऐसा निचोड़ सकें जिससे बिहार को तीव्र गति से विकास की धारा में लाया जा सके। आज सरकार की तरफ से इक्षाशक्ति है, बिहार के लोगों की तरफ से सापेक्ष सहयोग मिल रहा है, प्रवासी बिहारी भी अपने स्तर से प्रयास कर रहे हैं। ऐसे में जरूरत है सिर्फ इस बात कि एक फुलप्रूफ कार्य-योजना बनाई जाये जिस पर बिहार आगे बढ़े। जब हर नज़रिये से बातें सामने आएंगी तो निश्चित रूप से मंथन के बाद निचोड़ अमृत ही निकलेगा। बलते बिहार पर आयोजित यह वैश्विक सम्मेलन एक प्रयास है – सबों को साथ लाने का, मिल कर कम करने का। तो आइये, इस ऐतिहासिक पल के साक्षी बनें और अपने स्तर से बिहार के विकास में योगदान दें।

Tuesday, September 13, 2011

मॉरिशस और बिहार : दिल से जुड़े हैं दिलों के तार

Mr. Somduth,
वैसे तो पटना का रविन्द्र भवन कई ऐतिहासिक पलों का गवाह बना है पर 5 सितम्बर 2011 की शाम कुछ खास थी. लगभग 200 साल पहले बिहार की मिटटी के सपूत जो गिरमिटिया बन कर मॉरिशस ले जाये गए थे आज उनके वंशज गायक होकर वापस अपने पुरखों की धरती पे आये थे. मॉरिशस के सुन्दर मनराखन कॉलेज के छात्र-छात्राएं पहली बार बिहार में रामायण की चौपाइयों का गान प्रस्तुत करने आये. ये वो छात्र थे जो वहां हुई रामायण गान प्रतियोगिता के विजेता बने थे.  
Dr. Sukhda Pandey, Minister, ACY, inaugurating the program
जैसा कि मॉरिशस सनातन धर्मं टेम्पल फेडरेशन के अध्यक्ष श्री सोमदत्त जी कहते हैं कि ''जब बिहार, यू०पी0 से लोगों को मॉरिशस ले जाया गया था तो हमारे पुरखे अपने साथ राम चरित मानस ले गए थे. जब दिन भर वो लोग कड़ी मेहनत करते थे तो इस दौरान उन्हें चाबुक से मारा जाता था. उस कठिन दौर में वो लोग शाम के समय रामायण गाते थे ताकि अपने दर्द को भूल सकें. रामचरित मानस ही वो चीज़ थी जो उनलोगों को मॉरिशस में रहने की प्रेरणा देती थी, दर्द सहने की शक्ति देती थी.'' वो आगे कहते हैं कि 'आज भी हमलोग मॉरिशस में भारत को 'भारत माँ' कहकर ही बुलाते हैं. आज भी जब वहां पे बच्चा जन्म लेता है तो हम कहते हैं की घर में राम आये हैं. हम वहां होली दिवाली, दशहरा सब कुछ उसी तरह मनाते हैं जिस तरह यहाँ मनाया जाता है. आज यहाँ आकर ऐसा लग रहा है जैसे हम अपने घर में आये हैं.' ऐसे उद्गार सुनकर वहां मौजूद सबों में आत्मीयता का भाव स्वतः प्रस्फुटित हो गया था.

Ramayan Chanters chanting verses of Ramayan
मंच संचालक की भूमिका निभा रहे जय गोविन्द हीराजी ने सर्वप्रथम भोजपुरी में सभी कलाकारों से आग्रह किया कि 'कार्यक्रम के शुरुआत करे के पहिले ऊ धरती माँ के सत-सत नमन जे धरती से हमनी के पुरखा लोग गइल रहे' फिर उन्होंने कहा कि 'आज हम यहाँ ई बतावे आइल बानी कि बरसों दूर रह के भी हमनी के आपन संस्कृति नइखी भुलले. और एगो बात और बतावे के चाह तानी कि आज जब हमनी के आपन राष्ट्रपिता शिवसागर रामगुलाम जी के स्मारक देखे गईनी त अइसन लागल कि ऊ मुस्कुरा के हमरा से कहनी कि गिरमिटिया बन के गइनी और देख का बन के आ गइनी.' हमनी के बिहार सरकार के आभारी बानी कि ऊ हमार राष्ट्रपिता के स्मारक बन्वैलस. ई रामायण के गान त हमनी के और जगह भी गइनी पर जे अपनापन बिहार में लागता ऊ और कहीं महसूस न भइल.

'ओम' के उच्चारण के साथ कार्यक्रम की शुरुआत की गयी. तत्पश्चात 'श्री गुरु चरण सरोज रज' की स्तुति की गयी और phir कलाकारों ने 'आओ राम, संवारो राम, इस जग के बिगड़े काम' की प्रस्तुति कर संपूर्ण वातावरण को राममय कर दिया. ऐसा लग रहा था जैसे किसी मंदिर में बैठे हैं और अपना सर्वश्व भगवान को अर्पित कर दिया है. उसके बाद अयोध्या कांड की चौपाईयों में से 'उठो भरत राम मिलने आये हैं' का गायन सबको भाव विभोर किये जा रहा था. भ्रात्रि मिलन के ऊस दृश्य को अपने गायन से जीवंत कर दिया था उन छात्रों ने.राम और केवट  प्रकरण जिसमे केवट प्रभु श्री राम की नैया ये कहते हुए पार लगाते हैं कि जब इस धरती से मेरे प्राण जाएँ तो मैं आपके दर पे आऊँ का गायन बरबस ही मोक्ष की आशा में प्रभु की वंदना करने की भाव विह्वल प्रस्तुति थी.  इसी प्रकार रामायण के विभिन्न प्रकरण की चौपाइयों का गायन कर लोगों को मंत्रमुग्ध कर दिया था उनलोगों ने. कार्यक्रम ख़तम होने के पहले एक होली गीत भी प्रस्तुत किया गया,जिससे बरबस ही बिहार के गावों में विभिन्न टोलिओं द्वारा होली के समय गए जाने वाले गीतों की याद ताज़ा हो गयी.ऐसा लगा ही नहीं कि वो किसी दूसरे देश से आये हैं. कुछ घंटों में ही जो संस्कृति और अपनापन महसूस हुआ उसकी याद हमेशा रहेगी.
भारतीय सांस्कृतिक सम्बद्ध परिषद् (ICCR), मॉरिशस सरकार एवं कला, संस्कृति और युवा विभाग, बिहार के सहयोग से आयोजित इस कार्यक्रम में मुख्य अथिति के रूप में आमंत्रित श्रीमती सुखदा पांडेय, मंत्री, कला, संस्कृति एवं युवा विभाग, बिहार ने दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम की शुरआत की. अपने भाषण में माननीया मंत्री जी ने बताया कि ''मैं शाहाबाद से आती हूँ और श्री शिवसागर रामगुलाम जी के पुरखे भी उसी जगह रहते थे. इसलिए हमारा रिश्ता बहुत पुराना है, आत्मीय है. मैं यहाँ इंदिराजी की बात को दुहराना चाहती हूँ कि मॉरिशस वास्तव में 'लघु भारत' है.'' माननीया मंत्री जी ने सभी उपस्थित लोगों को फाउंडेशन की तरफ से नालंदा विश्विद्यालय अंकित मेमेन्टो देकर सम्मानित किया. अन्य उपस्थित लोगों में कला, संस्कृति एवं युवा विभाग के प्रधान सचिव सह मुख्य कार्यपालक पदाधिकारी बिहार फाउंडेशन श्री सी० ललसोता ने उपहार स्वरुप एक बैग सभी आगंतुकों को दिया, जिसमे बिहार से सम्बंधित फिल्मों की डीवीडी, बुकलेट इत्यादि थे.
मुझे याद नहीं कि भारत में कहीं भी रामायण गायन की प्रतियोगिता होती है. अब तो रामलीला का मंचन भी बहुत कम जगहों पर ही होता है. अक्सर ऐसे कार्यक्रम हमें हमारी संस्कृति की याद दिलाते हैं. अगर हम सीखना चाहें तो यह अवश्य ही सीख सकते हैं कि हम चाहे कितनी भी तरक्की कर लें पर हमें अपने संस्कारों को नहीं भूलना चाहिए. आज लगभग दो सौ सालों बाद भी उन लोगों ने रामायण को अपने अन्दर जीवित रखा है. ख़ुशी होगी अगर हमारे देश, हमारे राज्य में भी रामायण के गायन, अभिनय/मंचन से सम्बंधित प्रतियोगिता हो ताकि आने वाली पीढ़ी भी अपने गौरवपूर्ण अतीत को जान पाए और उससे कुछ सीख पाए. हो सकता है ऐसा करने से हमारी आने वाली पीढ़ियों में वो संस्कार दिखे जिसकी इच्छा सभी करते हैं और जो शायद आज खत्म होता जा रहा है.
खैर, कार्यक्रम के पश्चात् रात्रि में होटल में कुछ लोगों के साथ हमारी मण्डली जमी, जिसमे कई सारी बातें निकली. मॉरिशस में भी वो लोग कपिल शर्मा की कॉमेडी पसंद करते हैं. उनलोगों ने कई चुटकुले सुनाये जो अक्सर हमलोग एक-दूसरे को सुनाते हैं. गायकी का दौर चला. हिंदी और भोजपुरी गाने गाये उनलोगों ने. कहीं से भी ऐसा नहीं लग रहा था कि वो बाहर से आये हैं. बीच-बीच में कभी-कभार वो लोग किसी भाषा में बात करते जो हमारी समझ में नहीं आ रही थी. पूछने पर पता चला कि वो वास्तव में फ्रेंच भाषा की एक बोली (डैलेक्ट) है. उनकी भोजपुरी और हमारी भोजपुरी में सिर्फ स्वरों के उतार चढाव (एक्सेंट) का फर्क है. जो सम्प्रति फ्रेंच भाषा के प्रभाव के कारण है. पर इस मामूली से फर्क के बीच भी हम एक-दूसरे को एक-दूसरे के करीब ही पाते हैं, क्यूंकि हमारे दिल के तार सदियों से आपस में जुड़े हुए जो हैं. और शायद इसीलिए मॉरिशस को 'लघु भारत' कहते हैं.


Thursday, August 4, 2011

बिहारियों के तकनीकि विकास का सपना : अमित दास

आज भी इंटर की परीक्षा के बाद ज्यादातर अभिभावक अपने बच्चों में जिस भविष्य की तलाश करते हैं वो है मेडिकल और इंजीनियरिंग. जैसे ही इंटर की परीक्षा का परिणाम आता है लोग चेन्नई, बंगलुरु और कोटा जैसे शहरों का रुख करते हैं. इन शहरों में जाने वाले लोगों में ज्यादातर बिहार के लोग होते हैं. ये लोग बिहार से बाहर इसलिए जाते रहे हैं क्यूंकि बिहार में ऐसी सुविधा उपलब्ध नहीं थी. मजबूरियों में लोग अपने खून पसीने की कमाई दूसरे राज्यों में दे आते रहे हैं. कई लोग तो इन मजबूरियों के कारण अपना सपना पूरा नहीं कर पाते थे. ऐसा ही एक सपना अधूरा रह गया जो अररिया जिले के मृदौल ग्राम निवासी स्वर्गीय मोती बाबू ने भी देखा था - अपने बेटे को इंजिनियर बनाने का. उनका सपना तो पूरा नहीं हो सका पर आज उनके पुत्र श्री अमित दास कुछ ऐसा कर रहे हैं जिससे बिहार के उन तमाम लोगों का इंजिनियर बनने का सपना जरुर पूरा होगा जो किसी भी आभाव के कारण अपना सपना पूरा नहीं कर पाते थे.

अमित दास से मेरी पहली मुलाकात पिछले 'प्रवासी भारतीय दिवस' के दौरान हुई थी. सौम्य, शांत और हंसमुख व्यक्तित्व के मालिक अमित दास ने महज ३१ साल की छोटी सी उम्र में जो भी हासिल किया है वो किसी के लिए भी प्रेरणा का स्रोत हो सकता है. एक मुलाकात में अमित बताते हैं कि किस प्रकार उन्होंने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा सुपौल के बीरपुर से पूरी की, जहाँ छात्र बोरे पे बैठ के पढाई किया करते थे. स्कूलों में बेंच-डेस्क की सुविधा तक नहीं थी वहां पे. स्कूल की पढाई करने के बाद जब पटना के ए० एन० कॉलेज में नामंकन हुआ तो ऐसा लगा जैसे बहुत बड़ी चीज़ हासिल कर ली. उसके बाद वो भी और लोगों की तरह दिल्ली चले गए. काफी समय तक डी टी सी की बसों में धक्के खाए. उन दिनों बस यही सोंच रहती थी कि अपनी कमाई से अगर एक ट्रैक्टर खरीद पाए तो कुछ कर पाएंगे. धीरे-धीरे पता चला कि कंप्यूटर का कोर्स करने से कुछ अच्छा हो सकता है. पर इसमें भी दिक्कत थी. ज्यादातर बिहारियों की तरह अंग्रेजी कमजोर थी. पर रास्ता दिख गया था और वो मेहनत करने से पीछे नहीं हटने वाले थे. बिहारी लोग तो जन्मजात मेहनती होते हैं बस मौका मिलना चाहिए या रास्ता दिखाई देना चाहिए. पूरी ताकत लगा देते हैं बिहारी लोग. अमित दास ने भी पूरी ताकत लगा दी. धीरे-धीरे वे microsoft certified कंप्यूटर प्रोफेशनल बन गए. यहाँ से उनकी जिंदगी ने यू-टर्न लिया. अपनी एक कंपनी खोली. समय के साथ काम बढ़ने लगा. फिर मौका मिला और वो ऑस्ट्रेलिया चले गए. वहां भी अपनी एक कंपनी खोल ली. मेहनती अमित की किस्मत ने साथ दिया और वो तरक्की की सीढियाँ चढ़ते गए।

तरक्की की सीढियाँ चढ़ते हुए भी अमित दास को अपने पिता का सपना पूरा करने का ख्याल था और इसी उद्देश्य से उन्होंने इन्नोतेक एडुकेशनल सोसाएटी बनाई. इसी दौरान बिहार फौन्देशन के संपर्क में आये. उनके प्रोजेक्ट में हर संभव सहायता की गयी. ज्यादातर देखा गया है की जो भी लोग बिहार में निवेश के लिए आते हैं वो पटना या उसके आस-पास ही निवेश करना चाहते हैं. पर अमित दास तो अपने जिले में ये कॉलेज खोलना चाहते थे ताकि बिहार के उस सुदूर इलाके के लोगों का सपना न टूटे. सरकार की तरफ से आवश्यक औप्चारिक्तायें पूरी की गयीं. ज़मीन उपलब्ध करायी गयी. 16 अगस्त 2010 को फौर्बीसगंज में उनके कॉलेज का शिलान्यास हुआ. 110 करोड़ की लागत से बनने वाले इस कॉलेज में विश्वस्तरीय पढाई की व्यवस्था होगी. TAFE ऑस्ट्रेलिया के साथ उच्च स्तरीय शिक्षा की व्यवस्था की गयी है. यह सुविधा सेटेलाईट के माध्यम से भी सीधे ऑस्ट्रेलिया से उपलब्ध करायी जाएगी. पूर्व से ही छात्रों के प्लेसमेंट की भी पूर्ण व्यवस्था की गयी है, जो न सिर्फ भारत बल्कि विश्व स्तर तक होगी।


अमित दास का जज्बा बिहार के लिए सिर्फ अपने निवेश तक ही सीमित नहीं है. वो ऑस्ट्रेलिया में न सिर्फ बिहारियों को संगठित कर रहे हैं बल्कि एक australian कंपनी को भी बिहार में निवेश करने के लिए प्रेरित भी कर रहे हैं. इस कंपनी के प्रतिनिधि जब भी भारत आते थे तो सिर्फ दिल्ली या मुंबई तक ही जाते थे. बिहार के बारे में तो जो भी उन्होंने सुना था उससे उन्हें बिहार आने में डर लगता था. अमित दास ने किसी तरह न सिर्फ उन्हें विश्वास दिलाया की बिहार बदल गया है बल्कि उनके बिहार आने जाने और रहने का खर्च भी खुद दिया. हमने उनकी मीटिंग CM के निवेश सलाहकार और वरिस्थ्तम IAS अधिकारी श्री एस० विजयराघवन से करवाई. इस मीटिंग में सम्बंधित अधिकारी भी शामिल हुए. अमित दास का प्रयास सफल हुआ और कंपनी के प्रतिनिधियों ने बिहार में निवेश करने की बात कही. उनके जाने के कुछ दिनों के बाद मेरे पास कंपनी के एक प्रतिनिधि रोबर्ट का मेल आया जिसमे लिखा था कि 'दुनिया के कई हिस्सों में हम बिज़नस कर रहे हैं पर जो व्यव्हार और सम्मान बिहार में मिला वो कहीं नहीं मिला और ये हमारे बिज़नस के लिए बहुत महत्वपूर्ण है'. सौर उर्जा से पानी को पीने लायक बनाने वाली ये कंपनी नालंदा और पटना में पइलोत प्रोजेक्ट के रूप में कम शुरू करेगी और फिर सफलता के बाद मशीन के निर्माण हेतु संयंत्र भी लगाएगी. अगर सब कुछ ठीक रहा तो अनुमानित निवेश लगभग २५ मीलियन डॉलर का होगा।

पिछले साल एक संस्था ने अमित जी को उनके सरह्निये कार्यों के लिए 'बिहारी अस्मिता सम्मान दिया. मुझे अच्छी तरह याद है जब अमित दास लोगों से अपने विचार बता रहे थे तो खचाखच भरे श्री कृष्ण मेमोरिअल हॉल में काफी देर तक तालियों की गरगाराहत गूंजती रही. जब भी अमितजी से बात होती है एक ताजगी का एहसास होता है. जिसे सुनकर सहसा ही ये विश्वास होता है कि अब किसी पिता का सपना नहीं टूटेगा. उसके बेटे परदेस से इतने काबिल होके बिहार को विकसित बनाने के लिए लौट जो आये हैं. उम्मीद है शीघ्र ही और अमित बिहार लौटेंगे और बिहार में कई इंजीनियरिंग कॉलेज खोलेंगे जिससे बिहार के छात्रों को बंगलोर, चेन्नई और कोटा नहीं जाना पड़ेगा और बिहार का पैसा भी बिहार में ही रहेगा.

Saturday, November 6, 2010

प्रवासियों के पर्व Vs वासियों के पर्व

अमेरिका हो या इंग्लैंड, यु0ए0ई० हो या क़तर, कनाडा हो या नोर्वे या फिर मुंबई हो या बंगलुरु जहाँ भी बिहारी लोग जाते हैं अपनी संस्कृति को बरक़रार रखने का पूरा प्रयास करते हैं. भले ही कार्य करने का ढंग बदल जाता हो पर मूल में श्रद्धा वही होती है. हो सकता है अमेरिका, इंग्लैंड में दुर्गा, लक्ष्मी या गणेश की बड़ी मूर्तियाँ न मिल पायें, हो सकता है वहां बड़े-बड़े पंडाल और लाइटिंग की सुविधा न हो पर दिल में उत्साह वही रहता है, जिसे लेकर प्रवासी लोग अपने छोटे से समूह में ज़मा होते हैं और पूरे उत्साह से पर्व मनाते हैं. त्योहारों के मौसम के आते ही आप तमाम बिहारी संगठनों की वेबसाइट पे त्यौहार मिलन के कार्यक्रम की सूचना देख सकते हैं. लोग किसी रेस्टुरेंट, किसी पार्क या किसी के घर पे जमा होते हैं, एक दूसरे को मुबारकबाद देते हैं, भगवान की फोटो [कभी- कभी ये फोटो डिजिटल भी होती है] लगाईं जाती है, CD या DVD प्लयेर पर मन्त्रों का उच्चारण होता है, पर दिल में श्रद्धा उतनी ही होती है, जितना वो बिहार में रहते हुए रखते हैं. इन आयोजनों में मेहँदी प्रतियोगिता, म्यूजिकल चेयर इत्यादि का आयोजन किया जाता है. बच्चों को देवी, देवता का रूप देकर सजाया जाता है. केक काटा जाता है. यदा-कदा DJ का भी प्रबंध होता है. बिहार से सम्बंधित फिल्मों को दिखाया जाता है. यूँ कहें तो वहां उपलब्ध सुविधा के हिसाब से जितना हो सके बिहार के रंग में रंगने की कोशिश की जाती है.

अमेरिका में रहने वाले एक मित्र ने ऐसे ही एक आयोजन में बिहार से आने वाले एक मित्र के हाथों 'अनरसा' (बिहार में मिलने वाली एक मिठाई) मँगवाया था. ओवेन में पके लिट्टी चोखा का भी इंतजाम था. तमाम तरह के लज़ीज़ व्यंजन थे. पर आपको जानकर आश्चर्य होगा कि उन व्यंजनों के बीच अनरसा सबसे जल्दी ख़त्म हो गया था और लोग फिर भी उसकी ही डिमांड कर रहे थे. ओवेन में पके लिट्टी-चोखा में अपने घर में कोयले पे पकने वाले लिट्टी-चोखा का स्वाद खोज रहे थे. ऐसे त्योहारों के मौकों पर होने वाले इस मिलन में तमाम तरह के व्यंजनों के बीच लिट्टी-चोखा और अनारसा का होना ही इस बात को साबित करता है कि प्रवासी लोग पर्व के मौके पे पूरी तरह से अपने बिहार के रंग में रंगने की कोशिश करते हैं. अभी हाल में ही अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, बहरैन, UK में दुर्गा पूजा का आयोजन किया गया था. अब दिवाली मनाई जाने वाली है. ऑस्ट्रेलिया के एडिलेड तथा सिडनी में दिवाली मिलन पूरे उल्लास से मनाया गया है।

वहीँ बिहारवासियों ने भी अपने अंदाज में दुर्गा पूजा मनाई और दिवाली तथा छठ की तैयारी चल रही है. बिहार में होने वाली दुर्गा पूजा को आप पटना की दुर्गा पूजा के माध्यम से मेरे पिछले पोस्ट में देख चुके हैं. जिन्होंने नहीं देखा है वो कृपया इस लिंक पे जाएँ - http://biharfoundation.blogspot.com/2010/10/blog-post_17.html. आगे अब दिवाली धूमधाम से मनाई जा रही है. जगह-जगह लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियों के दुकान सज गए हैं. लोग अपने-अपने घरों की रंगाई-पुताई करवा रहे हैं. परदे कैसे लगेंगे, दीवारों पर कौन सा रंग चढ़ेगा, दिवाली में रंगोली कैसी सजेगी, छत पे कैंडिल कैसा लगेगा, जलते-बुझते बल्बों की लड़ियों को कहाँ पे लगायें. ऐसी तमाम छोटी-बड़ी चीज़ों पे घर में बहस होती है. फिर सबकी सहमति से निर्णय लिया जाता है. दीपों की सजावट से घर को रौशन करना है ताकि माँ लक्ष्मी घर में प्रवेश करें. पंडित जी की अडवांस बुकिंग चल रही होती है. पटाखों की दुकाने सज गयी हैं. बच्चों ने पापा मम्मी की नाक में दम कर दिया है. मुझे तो बम ही लेना है. फुलझरी की रौशनी से उतना मज़ा नहीं आता, जितना बम की आवाज से आता है. पूरा मोहल्ला गूंज उठता है. पड़ोस के अंकल की गुस्से भरी आवाज से तो और मज़ा आता है. पटाखा पहले से नहीं फोड़ेंगे तो पता कैसे चलेगा की दिवाली आ गयी है. ऐसे दृश्य आम हो जाते हैं. हमारे बचपन में भी कुछ ऐसा ही होता था. पहले शिवकाशी से बने पटाखे आते थे. मुर्गा छाप पटाखें. अब तो चाइनीज पटाखें हैं. अनार से अब रंग-बिरंगी रौशनी निकलती है. फुलझरियां और बम का फ्यूज़न हो गया है. पहले रौशनी निकलती है, बाद में धमाके की आवाज भी आती है. हमारे समय में ऐसा गलती से हुआ करता था, पर अब तो ऐसे पटाखें डिमांड से बनते हैं.

त्योहारों के आते ही प्रोडक्ट्स पे ऑफरों की बाढ़ आ जाती है. टीवी के साथ वाशिंग मशीन फ्री. सोने के गहने लेने पे एक गणेश जी फ्री. और न जाने क्या-क्या. धनतेरस को तो कुछ खरीदना ही पड़ता है. इतनी मंहगाई बढ़ गयी है, की लोग असमंजस में पड़ गए हैं की क्या लें. पर कुछ तो लेना ही है, इसलिए बोरिंग रोड हो या एग्जिबिसन रोड या फिर पटना मार्केट या हटुआ मार्केट सभी जगह भारी भीड़ चल रही है. ऐसा ही हाल लगभग हर शहर का होता है. दुकानदारों को फुर्सत नहीं है. आपको अपना सामान मिल गया तो बड़ी खुशनसीबी. नहीं तो दुकान वाले को भला बुरा कहते हुए दूसरे दुकान में घुसिए. धनतेरस के दिन मेरी बीबी ने भी फरमाइश की - घर जल्दी आ जायियेगा, तनिष्क में चलेंगे. मन में डर हुआ कि पता नहीं कितनी जेब ढीली होगी. पर रिवाज़ है भाई. कुछ न कुछ तो लेना ही पड़ता है. वरना लक्ष्मी जी (घरवाली भी और मंदिर वाली भी) नाराज़ हो जाएँगी. और भला लक्ष्मी माता को नाराज कौन करना चाहेगा. इसी लक्ष्मी के लिए तो वासियों को प्रवासी बनना पड़ता है. घर के बाकी लोग पीछे छूट जाते हैं. दोस्त यार सब रह जाते हैं.
पर्व के समय ये कमी खलती है. वासी माता-पिता, प्रवासी बच्चों को मिस करते हैं. काश इस बार तो बेटा दिवाली में साथ होता, वहीँ प्रवासी बच्चे भी वासी माता-पिता को याद करते हैं (इस पर एक आपबीती घटना सुनाऊंगा कभी) काश घर जाते तो छठ के ठेकुआ, पिडुकिया तो खाते. घाट पे जाते. बहनें भैया दूज पर अपने भाइयों को याद करती हैं. बजरी-लड्डू कौन खायेगा इस बार. शायद इसी कमी को पूरा करने के लिए लोग परदेस में भी इक्कठे हो जाते हैं। एक दूसरे में उन रिश्तों को तलाशते हैं। जिस तरह संभव हो पाए उसी तरह पर्व मनाते हैं।
अक्सर वासी लोग प्रवासियों को देख कर सोंचते हैं कि काश हम भी अमेरिका, इंग्लैंड जा पाते. खूब पैसे कमाते पर जरा प्रवासियों से भी तो पूछ कर देखिये. पर्व तो वहां भी मना ही लेते हैं पर मन में यही सोंच होती है कि काश हम भी घर पे होते. ये डिसाइड करते की कौन सा रंग लगेगा. दोस्तों से मिलते, मेला घूमते, ये करते, वो करते, काश! हम भी घर पे होते.

Friday, October 22, 2010

बिहार लौटते प्रबुद्ध युवा

कुछ दिनों पहले निर्माण फौन्डेशन के राकेश प्रकाश, आयुष आनंद और मनीष कुमार जब मुझसे मिलने आये तो इन युवाओं को देख कर मैं थोडा सशंकित हुआ कि पता नहीं जिस मुद्दे पे ये बात करने आये हैं उसको लेके ये कितने सजग हैं। कम उम्र पर योजना बड़ी। ये लोग अमेरिका में रह रहे एक प्रवासी बिहारी वैज्ञानिक के संरक्षण में "बिहार साइंस चैलेन्ज" नाम से एक कार्यक्रम का आयोजन बिहार में करना चाहते थे। उद्देश्य था १० से १७ साल के युवा बिहारियों के दिमाग में एक वैज्ञानिक सोंच को बढ़ावा देना, जिसके माध्यम से बिहार की कुछ मूलभूत समस्याओं के लिए एक मौलिक समाधान खोजना। इस प्रतियोगिता के बिषय भी बड़े रोचक रखे हैं इन्होने, जैसे - 'बिहार गो ग्रीनर', 'इनोवेटिव टेक्निक फॉर इर्रिगेशन', 'पटना ट्राफिक मनेजमेंट, 'रेन वाटर हार्वेस्टिंग', 'कैच द क्रिमिनल्स इन सिक्सटी सेकेण्ड', 'पॉवर ओउतेज सोलुशन'। पुरष्कार की राशि भी आकर्षक है।- प्रथम स्थान प्राप्त करने वाले को ५१०००, द्वितीय को २१००० और तृतीय को ११०००। इसके अलावे १५ लोगों के लिए सांत्वना पुरष्कार भी है। नवम्बर में होने वाले इस आयोजन से उम्मीद है की इससे बिहारी बच्चों में कुछ वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित होगा। साथ ही बिहार की कुछ समस्याओं का अच्छा समाधान मिल जाये.

बातचीत के क्रम में पता चला की ये सभी आई आई टी से पास और एक बड़े ही प्रतिष्ठित कम्पनी में काम कर रहे थे। उनमे से एक मनीष कुमार अभी भी ONGC में काम कर रहे हैं। तो फिर ये सब अच्छी सैलरी और प्रतिस्था वाली नौकरी छोड़ के बिहार में क्यूँ काम करने आ गए। अजी साहब ये नया पैशन है प्रबुद्ध युवाओं का। नया जोश, सब कुछ बदल देने का जज्बा। या शायद वो दर्द जो इस पीढ़ी ने झेला है बिहारी होने के नाते। हर जगह अपनी पहचान छुपाये, डरे सहमे, न जाने किस बात के लिए बलि का बकरा बना दिया जाये। पर शायद इन मुश्किलों से जूझते हुए ही लड़ने की ताकत आ गयी है। और खड़े हो गए हैं अपने बिहार को बचाने के लिए। इसके विकास के लिए योगदान देने के लिए। या शायद वो खोयी हुई प्रतिस्था फिर से पाने के लिए, जब बिहारी कहलाना गर्व की बात होती थी.


बरबस ही याद आ गयी डॉ० रवि चंद्रा की, जिन्होंने IRMA से कोर्स करने के बाद अच्छी नौकरी छोड़ 'बिहार देवलोपमेंट ट्रस्ट' नाम से संस्था बना कर बिहार के गरीब लोगों को स्वरोजगार उपलब्ध कराने के उद्देश्य से माइक्रोफिनांस के क्षेत्र में काम शुरू किया। आज वो काफी अच्छा काम कर रहे हैं। उम्मीद करता हूँ की आनेवाले दिनों में वो कुछ वैसा कर पायें जैसा की बंगलादेश के मोहम्मद युनुस ने अपने देशवासियों के लिए किया था।

इन्ही युवाओं में दो ऐसे नाम हैं जिनसे आप सभी परिचित हैं। एक हैं आई आई एम् सब्जीवाले के नाम से मशहूर नालंदा जिले के कौशलेन्द्र और दूसरा बेगुसराई के इरफ़ान आलम। आई आई एम् अपने आप में ही एक ब्रांड है। सभी जानते हैं कि उसके नाम पे लोगों को कितने अंकों वाला वेतन मिल सकता है, पर उसे छोड़ के बिहार में ऐसा काम शुरू करना जिसके बारे में ज्यादा लोग सोंच भी नहीं सकते। पर आज सभी जानते हैं की उनके इस प्रयास से कितने ही किसानों की जिंदगी बदल गयी। हो सकता है भविष्य में बिहार सब्जी के सबसे बड़े उत्पादक और बाज़ार के रूप में उभर कर सामने आये। जिस प्रकार फलों खास कर नारंगी ने अमेरिका के कैलिफोर्निया का रूप बदल दिया, मुझे लगता है ठीक उसी तरह एक दिन फ़ूड प्रोसेसिंग के क्षेत्र में बिहार का भी नाम होगा, जिसकी शुरुआत के लिए कौशलेन्द्र जैसे युवाओं का नाम जरुर लिया जायेगा। इरफ़ान आलम के सम्मान फौन्देशन ने कितने ही रिक्शा वालों को सम्मान के साथ जीने का हौसला दिया। मुझे याद है किस तरह से इरफ़ान एक चैनल की एक प्रतियोगिता 'बिज़नस बाज़ीगर' के विजेता बने थे। ये बिहारी लोगों का जन्मजात टैलेंट होता है। जहाँ जाते हैं छा जाते हैं। अब तक यह टैलेंट दूसरों के लिए कार्य करता था पर अब यह अपने बिहार के लिए कार्य करने को आतुर है.

एक और प्रगतिशील युवा हैं नितिन चंद्रा। इनका माध्यम थोडा अलग है पर मकसद वही है बिहार की तरक्की। फ़िल्में बनाते हैं। कुछ साल पहले इन्होने एक फिल्म बनाई थी - 'Bring Back Bihar' जिसमे बिहार को वापस लाने की बात रखी गयी थी। बिहार फौन्देशन के लिए भी एक फिल्म बनाई - 'A New Chapter' जो प्रवासी बिहारियों पर आधारित थी और बिहार फौन्देशन के आने से प्रवासियों में जो एक उम्मीद जगी है उसको चित्रित किया गया है। अभी हाल में इन्होने 'Deswa' नाम से एक भोजपुरी फिल्म का निर्माण किया है। जिसमे भोजुपरी को हिंदी सिनेमा के समान्तर ला कर खड़ा करने का प्रयास किया जा रहा है। इस फिल्म में उन्होंने बिहारी थीएटर से जुड़े लोगों को मौका दिया है और फिल्म की ज्यादातर शूटिंग बिहार में ही की है। इन्होने और नीतू चंद्रा ने मुंबई में हुई एक मुलाकात में पटना में अपना एक एक्टिंग ट्रेनिंग स्कूल खोलने की इच्छा व्यक्त की थी - चंद्राज़ के नाम से.

ये ट्रेनिंग स्कूल ये लोग मुंबई में भी खोल सकते हैं, पर बिहार को आगे बढाने की इनकी सोंच ही उन्हें बार-बार बिहार ले आती है। हम ऐसी उम्मीद करते हैं कि deswa फिल्म भोजपुरी के इतिहास में एक नया अध्याय शुरू करेगी।

एक और युवा हैं बिभूति बिक्रमादित्य - द० कोरया में अच्छी खासी नौकरी कर रहे हैं पर बिहार को वापस लाने का जज्बा इन्हें बार-बार बिहार ले आता है. विज्ञान के क्षेत्र में बिहार को आगे ले जाने के उद्देश्य से हर साल 'इंडियन साइंस कौंग्रेस' के तर्ज पर 'बिहार साइंस कौंग्रेस' का आयोजन करते हैं. मैं भी अपने कॉलेज के दिनों में इंडियन साइंस कौंग्रेस का सदस्य हुआ करता था जिसका उद्घाटन प्रतिवर्ष प्रधानमंत्री करते थे और उसमे देश के तमाम वैज्ञानिक और उसमे रूचि रखने वाले लोग इकठ्ठा होते थे. अभी हाल ही में इन्होने पटना ट्रैफिक मैनेजमेंट के लिये अपने सुझाव प्रस्तुत किये हैं. इनकी योजना बिहार में एक टेक्नीकल इंस्टिट्यूट स्थापित करने की भी है. साथ ही कोरया में ये बिहार फौन्देशन को भी फैला रहे हैं।

ऐसे कई युवाओं के मेल मुझे आते हैं जो अभी अपने फ़ाइनल इयर में हैं या किसी प्रतियोगिता परीक्षा के साक्षात्कार में जाने वाले हैं और वो बिहार के लिए कुछ करना चाहते हैं. मेरी उनको निजी सलाह होती है कि पहले वो खुद को करियर में स्थापित करें फिर वो बिहार के लिए ज्यादा अच्छे से योगदान दे पाएंगे. पर सोंचने वाली बात ये है कि आज युवाओं में बिहार के लिए कुछ करने कि प्रवृति बढ़ रही है. ये शायद बिहारी होने का दंश झेलने के कारण हो या फिर जैसी सुविधा और वातावरण वो दूसरे राज्यों या देशों में देखते हैं वैसा ही बिहार में भी बनाना चाहते हो ताकि आने वाली पीढ़ी को वो सब न झेलना पड़े जो हमें झेलना पड़ा है.

Sunday, October 17, 2010

पटना की दुर्गा पूजा

यूँ तो दुर्गा पूजा में कई शहरों में रहने का मौका मिला है। हो सकता है कई जगहों की पूजा में तकनीक और मूर्तिकला का ज्यादा अच्छा उदाहरण (जैसे कोलकाता में) देखने को मिलता हो, पर जो अपनापन बिहार की पूजा में मिलता है वो शायद ही कहीं महसूस होता है. इस बार भी पटना की पूजा में वही अपनापन और जोश देखने को मिल रहा था।

पंडालों की सज्जा हो या मूर्तियों का डिजाईन, हर प्रस्तुति अपने आप में अलग थी। अलग-अलग थीम पर पंडालों की सजावट इस बार भी देखते ही बनती थी।

कहीं पर मंदिरों का डिज़ाइन बनाया गया था तो कहीं कोई दृश्य। 

पर असली आकर्षण तो वो पंडाल थे जहाँ तकनीक का इस्तेमाल कर प्रदर्शन किया गया था. लाइट और साउंड के प्रयोग से दिखाया जा रहा था की किस प्रकार देवी दुर्गा महिसासुर का वध कर रही हैं. जलती बुझती रौशनी के बीच एक त्रिशूल और तीर आके महिसासुर को लगता था. साथ ही बैक ग्राउंड में अट्टहास और अन्य आवाज़ प्रदर्शन को जीवंत बना रही थीं. एक अन्य पंडाल में राक्षश के मुख में गुफा की शक्ल दी गयी थी और अन्दर में देवी की प्रतिमा स्थापित की गयी थी. बाहर के भाग में करीब २०-२५ फीट ऊँचा पहारनुमा आकृति थी जिस पे भागीरथ द्वारा गंगा को धरती पे लाने का दृश्य दिखाया गया था. जलती-बुझती रौशनी और साउंड इफ्फेक्ट के बीच पानी की निकलती धारा गंगा के धरती पे आने का उत्तम प्रदर्शन था. इन जगहों पे लोगों की भीड़ बेकाबू हो रही थी।

कई जगहों पे मूर्तियों की सुन्दरता भी देखते ही बनती थी. साथ की सजावट से इसमें चार चाँद लग गया था. रोड के दोनों तरफ ट्यूब लाइट की रौशनी पुरे पटना को जगमग बना रही थी. मुख्य सड़कों का शायद ही कोई इलाका दिखा जहाँ रौशनी नहीं थी. सड़कों पे पूरी चहल पहल दिख रही थी. कारों और बाइक का काफिला कई जगहों पे अटका पड़ा था. उनकी गति भी पैदल चलने वालों के सामान ही धीमी थी। हाथों में हाथ डाले लोग (जोड़े) अब पटना की सडको में बड़े बेफिक्र हो के घूम रहे थे और पूजा का आनंद उठा रहे थे. मुझे याद है कॉलेज के वो दिन जब इन्ही पटना की सड़कों पे ऐसे लोग शायद ही दिखते थे. इसी भीड़ में कई युवा जोड़ों को पीछे छोड़ता हुआ एक बुजुर्ग जोड़ा एक दूसरे का हाथ पकडे तेज़ी से आगे निकलता हुआ दिखा. माता-पिता या बड़े भाई-बहन अक्सर छोटे भाई-बहनों का हाथ पकड़ कर इसलिए चलते हैं कि कहीं खो न जाएँ. कई लोग इस भीड़ में खो भी जाते हैं. ऐसे में इस बार भी जगह-जगह पे पंडालों में अनाउंस किया जा रहा था खोये हुए लोगों के बारे में. एक जगह पे अनाउंसर कुछ इस तरह से कह रहा था - 'रिन्कुजी आप जहाँ कहीं भी हों पंडाल के गेट पे चले आयें आपके घरवाले बड़ी ही बेशर्मी (शायद वह बेशब्री कहना चाह रहा था) से आपका इंतज़ार कर रहे हैं.' इस तरह से उसने कई बार अनाउंस किया. लोगों को इस तरह कि बात सुनकर बड़ा मज़ा आ रहा था।
बेली रोड पे राक्षश कुल का एक प्राणी अपनी चमकती हुई सींघों के साथ आगे बढ़ रहा था, जिसे देख बच्चे डर जा रहे थे. कुछ बड़े बच्चे चमकने वाली सींघ की दुकान खोज रहे थे. हर बार पूजा में कोई न कोई इस तरह की नयी चीज़ बाज़ार में आती है जो बच्चों और युवाओं का आकर्षण बनती है. जगह-जगह खिलोने, मूर्तियों की दुकाने सजी पड़ी थीं. इनमे बंदूकों की बिक्री शायद सबसे ज्यादा होती है. मुझे याद है हमलोग दुर्गा पूजा से ही अपने पिताजी से बन्दूक खरीदवा लिया करते थे और छठ तक चोर- पुलिस खेला करते थे. आज भी बंदूकों का क्रेज बरक़रार है. छोटे-बड़े तरह-तरह के झूले बच्चे तो बच्चे, बड़ों के भी आकर्षण का केंद्र बने हुए थे. कुछ चीज़ें सदाबहार होती हैं. फर्क सिर्फ तकनीक का आ जाता है. आज के झूले कई तरह के हो गए हैं. गोलगप्पे जिसे पटना में हमलोग फोक्चा के नाम से जानते हैं, चाट पकोरे, आइसक्रीम इत्यादि की दुकाने, ठेले लगे हुए थे और हर बार की तरह लोगों की भीड़ इन सड़क के किनारे मिलने वाले व्यंजनों का आनंद ले रही थी.
नवमी के दिन सुबह से हो रही बारिश से तो लगता था कि इस बार पूजा का मज़ा किरकिरा हो गया, पर शाम होते-होते सबकुछ सामान्य हो गया था और लोगों कि भीड़ उसी उत्साह से पटना घूम रही थी और पटना के दुर्गा पूजा का आनंद उठा रही थी. इस भीड़ में कुछ पराये भी थे कुछ अपने भी।
हम चाहे जहाँ कहीं भी चले जाएँ, कितनी सुविधाओं में क्यूँ न रहने लगें पर पर्व के समय अपने बिहार में रहना ही सबसे ज्यादा खुशी देता है. वो अपनापन, वो लगाव जो यहाँ है, वो शायद कहीं नहीं है. वैसे लोग जो किसी कारणवश घर नहीं आ सके उम्मीद है उन्हें इससे अपने बिहार कि कुछ झलक जरुर मिलेगी. अपने विचार और अनुभव हमें जरुर बताएं. कुछ संकलित तस्वीरों के साथ आपको छोड़ रहा हूँ. आप सबों को दशहरा  की  ढेर सारी शुभकामनायें.

Wednesday, October 6, 2010

प्रवासियों को वोटिंग का अधिकार

प्रवासी भारतीय दिवस करीब आ रहा है। केंद्रीय मंत्री श्री व्यालार रवि अपने सन्देश में कहते हैं - "मुझे बताते हुए ख़ुशी हो रही है की नॉन रेसिडेंट इंडियनस को वोट देने से सम्बंधित बिल संसद ने पास कर दिया है।" हो सकता है एन आर आई के लिए ये ख़ुशी की बात हो, पर क्या वैसे प्रवासियों को वोट देने का अधिकार नहीं है जो अपने ही देश में अपनी ज़मीन से दूर रहते हैं?

मुंबई में रह रहे हसन कहते हैं - इच्छा तो बहुत होती है कि हम अपने क्षेत्र के लिए एक सही प्रतिनिधि चुनें पर इतनी जल्दी जा नहीं सकता, अभी ईद में ही वापस आया हूँ। कुछ इसी तरह कि बात गुडगाँव के एक मल्टी नेशनल कंपनी में काम करने वाले एक इंजिनियर आलोक कहते हैं - दुर्गा पूजा, दिवाली और छठ में से किसी एक पर्व में ही जा पाऊंगा। पर्व के समय टिकेट मिलना बहुत मुश्किल होता है। अभी छठ का टिकट मिला है, पर उस वक़्त मेरे इलाके में चुनाव हो चूका होगा। चाहकर भी भाग नहीं ले सकता। एक अच्छे प्रतिनिधि से ही क्षेत्र का विकास संभव हो पाता है। और सबसे बड़ी बात अपनी पहचान की है। कोई अच्छा प्रतिनिधि ही अच्छी पहचान प्रस्तुत कर सकता है, जिसपे हम प्रवासी लोग भी गर्व कर सकें।
सिर्फ हसन और अलोक ही नहीं ऐसे तमाम लोग हैं जो किसी न किसी मज़बूरी की वजह से वोट नहीं दे पाते हैं । मज़बूरी चाहे नौकरी की हो या पैसे की या फिर हालत की । पर यह सत्य है करोरों लोग अपने उस अधिकार से वंचित रह जाते हैं जिस पे उनका तथा उनकी आने वाली पीढ़ी का भविष्य टिका होता है। ऐसी भीड़ में सिर्फ अपने राज्य से बाहर रहने वाले ही नहीं, अपने ही राज्य के दुसरे जिले में रहने वाले भी तमाम लोग शामिल हैं जो वोटिंग के अधिकार से वंचित रह जाते हैं।
आज जब एन आर आई लोगों के लिए वोट देने का अधिकार दिया जा रहा है तो यह सवाल उठाना भी लाजमी है की सरकार अपने ही देश में रहने वाले प्रवासियों की वोटिंग में भागीदारी सुनिश्चित करे। सम्प्रति केंद्र सरकार विदेशों में स्थित भारतीय दूतावास के माध्यम से एन आर आई को वोट देने की सुविधा देने वाली है। तो फिर कोई ऐसी व्यवस्था क्यूँ नहीं की जा सकती की प्रवासी लोग अपनी कर्मभूमि में रहते हुए भी अपने जन्मभूमि के लिए एक अच्छे प्रतिनिधि का चुनाव कर सकें। आज संचार क्रांति की धूम है। उसका प्रयोग किया जा सकता है। पहले लोग बैलट पेपर का इस्तेमाल करते थे, आज अनपढ़ लोग भी इवीएम् मशीन पे बड़ी ही आसानी से वोट दे रहे हैं। बदलाव आता है तो लोग धीरे-धीरे सीख ही जाते हैं। तो एक बदलाव इस क्षेत्र में और लाया जाये, जिससे की प्रवासियों की वोटिंग में भागीदारी हो सके। वो सिर्फ मजबूरियों की वजह से अपने इस बहुमूल्य अधिकार से वंचित न रह पायें।
आज तमाम सोशल नेट्वोर्किंग साइट्स पे लोग बिहार में होने वाले चुनाव के विषय में बात करते हैं, अपने सुझाव देते हैं, लोगों से अपील करते हैं की उन्हें चुने जो बेहतर हैं पर अपने वोट के बारे में मन मसोस कर रह जाते हैं। अगर सरकार और चुनाव आयोग इसतरह की कोई व्यवस्था कर पाए तो हो सकता है की नतीजा कुछ सकारात्मक निकले। एक सर्वे के मुताबिक लगभग ४५ से ५० लाख लोग २००९ में बिहार से बाहर गए। प्रतिवर्ष काफी बड़ी संख्या में लोग बिहार से बाहर जाते हैं। चुनाव आयोग के अनुसार आज बिहार में साढ़े ५ करोड़ मतदाता हैं। अगर पिछले चुनाओं के प्रतिशत पे ध्यान दें तो पाएंगे की औसतन २० से ३० प्रतिशत लोग ही वोट दे पा रहे हैं। तो क्या वोट ना दे पाने वालों में एक बड़ी संख्या उनकी है जो माइग्रेट कर गए हैं। तब तो यह और भी आवश्यक हो जाता है की माइग्रेट करने वालों को वोट देने की कोई व्यवस्था की जाये। अगर दुसरे नजरिये से देखेंगे तो क्या जो प्रतिनिधि चुन कर आते हैं वो सिर्फ मुठी भर लोगों द्वारा ही नहीं चुने जाते हैं? तो फिर कैसा लोकतंत्र हुआ यह? क्या ऐसी स्थिति में सरकार और चुनाव आयोग की जिम्मेदारी नहीं बनती की ज्यादा से ज्यादा लोगों की भागीदारी सुनिश्चित की जाये जिससे की एक वैसा प्रतिनिधि चुना जा सके जो ज्यादातर ( कम से कम ५०% से ज्यादा) लोगों द्वारा चुना जाये। तभी शायद लोकतंत्र अपने सही रूप में कहा जा सकेगा और प्रवासियों को वोट देने की व्यवस्था करना इसमें एक सार्थक कदम हो सकता है।

Sunday, July 4, 2010

Vishwas Yatras, an enriching experience

The last two months – devoted to the ‘Vishwash Yatras’ - have been excruciatingly hectic… reason why I could hardly interact on the blog। But these have been truly and immensely insightful.

Honestly speaking, I felt duty-bound to undertake this campaign। On assuming charge as the CM, I had promised that I would not go back to the people to seek their votes for another term if I realized that my government had failed to deliver. The benchmarks were laid out by the Vikas Yatra undertaken then by us…॥ This Vishwash Yatra (after four and a half years of our government) therefore became essentially an exercise in self appraisal and assessment.

Having concluded the Yatra, I have today, like most of our brethren in the state, a fairly modest sense of assertion that Bihar is very much on the way to better, more secure times। One could easily sense that across sectors, schemes and programmes, the foundations that have been laid are strong enough to sustain progresses over time. You would surely appreciate that laying down the footings was the most critical and yet most consuming of the tasks cut out for any new government here.

Of course, I am not entirely satisfied, and a lot is still to be done। Having said that, rapid growths in key spheres achieved over the past four-and-a-half years do not escape notice anymore. Importantly, we are also witnessing a very positive social assertion, thanks particularly to the empowerment of our womenfolk, and a genuinely growing sensitivity among the rural poor towards education. I have always maintained that only when the masses begin to have a natural sense of ownership can any development sustain. It feels good that bettering health services, transport and communication infrastructures, etc are there to aid this social change.

It is vital to note here that this social transformation, or for that matter, any development, would not have been possible without peace in society। I had shared in one of my previous posts that ensuring lasting peace was a critical bottom-line for my administration. I am happy at the yields today.

In the course of my Vishwas Yatra, I wanted to review the development projects launched by the state government in different districts. This would have been possible only by visiting different areas, interacting with people and reviewing the progress of the work with the district officials.
The format of the Vishwas Yatra enabled me to achieve my objective। I started off my yatra with a visit to a village in the morning during which the chief secretary or the development commissioner used to accompany me. These top bureaucrats sometimes were in such villages where even a block development officer may hardly ever have turned up in the past.

This enabled us to oversee projects and schemes, identify problems on the spot and take suitable immediate steps. It was essentially a reality check even as we took governance to people’s doorsteps.
A review meeting with the district officials after the visit to the village was part of the yatra। It was the first time a chief minister held such a meeting at the district headquarters. I had fixed 23 subjects to assess the development works in a district. Each meeting used to last for at least four hours during which we identified bottlenecks and tried to remove them.

I used to address a public rally at the district headquarters in the evening before dropping in on a local associate or a party worker’s house for dinner। At the outset, it was originally planned that I would address only one rally at the district headquarters. But I invariably ended up addressing two rallies in a day. henever I went to a village in the morning, I always found a large crowd waiting patiently for us. During these two rallies, I used to address at least 30,000 people a day.

The Vishwas Yatra was, however, not merely an exercise to review the development projects or to get a feedback of the people on my government’s performance। It was also an opportunity to feel the winds of changes across the state. During this yatra, I experienced many positive changes. There are a few examples which come quickly to my mind.

I visited Dharhara village in Bhagalpur district where people planted ten trees of fruits for every girl child born there. This was a novel concept which was not only environment-friendly but was also aimed at safeguarding the future of the girl child. Its novelty apart, it is so intimately contextual in our times that I wouldn’t be amazed if this model is soon showcased as an ideal social practice in many part of India.

I also visited the house of a schoolgirl Khushboo at her Bhogaon village in Katihar district। Khushboo was the second topper in this year’s matriculation examination. She fought against all odds to achieve this distinction. Her school was located five kilometre away from her village but that was no deterrent for her. She said the bicycle that she got under the Mukhyamantri Balika Cycle Yojna helped her in her preparation for the examination. She could save her time earlier spent on commuting and devoted it towards her studies. I had a sense of satisfaction when I handed over the cheques to her for her achievements….and a hope that she becomes a role model for many youngsters.

My visit to Aurahi Hingna in Araria district, the native place of the great Hindi litterateur Phanishwar Nath Renu was a very emotional experience. Renuji had penned down several novels and stories like Maila Anachal and Parti Parikatha, depicting the lives of the people from the underprivileged sections of society in the Kosi belt. I chose to travel by road in the Kosi belt to see the region so vividly described in Renu’s masterpieces.

I met two of Renu ji’s wives -- Padmaji and Latikaji -- at the village. When I touched their feet, they blessed me affectionately. They later send local delicacy patua ka sag & roti for me in circuit house. Since the region has been famous for kattha (catechu), I decided to develop a forest for khairwood which will be known as “Renuvan”…. a small tribute to Renuji’s great legacy.

I must admit however that some other experiences have been terribly moving as well। I visited a village in Munger district where scores of people were disabled because of the excessive fluoride content in water. I was dismayed to learn that successive government had failed to provide safe drinking water to the village. .There are other areas in the state where arsenic content in water is posing health problems to a large number of people.

This is why I said in the beginning that I am not fully satisfied. A lot of things are to be done, and we are already in the process of prioritizing some of these.

On a more personal note, I must share with you that I have not taken any leave as such during my tenure. I once went to Mumbai for a day to receive an award, and stayed in Bangalore for a night for a wedding. I also went to Punjab and Kolkata for election campaigns and visited Mauritius once as part of an official delegation.
I have been working everyday without a break, thinking often of the philosophy of “aharnish seva (uninterrupted work through day and night)”। I understand this will need to go on, without any let up…. in the hope of more and more people joining together to bring a brighter future for all of us.

Until next, Thank you।

Nitish Kumar